कारम बांध: दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो

धार जिले की कारम नदी पर 304 करोड़ रुपए से बनाया जा रहा बांध भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. इस बांध में गत दिनों रिसाव हो गया जिसके कारण बांध का पानी खाली करना पड़ा. मूल योजना के अनुसार इस बांध से 42 गांव के खेतों में सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराना था, लेकिन बांध इन्हीं गांव के लिए आफत बनकर सामने आया. स्थिति यह हो गई कि 18 गांव के 40,000 लोग करीब 4 दिनों तक घर से बेघर हो गए. जब वे घर वापस आए तो घर या तो टूट गया था या बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था.लोगों को रहने का संकट तो है ही साथ ही खेतों पर खड़ी फसल बर्बाद हो गई और बांध का पानी खाली करते समय पानी के अत्यधिक भाव के कारण खेतों से मिट्टी भी बहा ले गई. अब उन खेतों में पत्थर ही पत्थर बचे हैं, जहां अब खेती होने की संभावना नहीं है. इस तरह से यह बांध 18 गांव के 40,000 लोगों के लिए बड़ी विपदा बनकर सामने आया. ऐसी विपदा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी. जो स्थिति है उसके अनुसार अब प्रभावित गांव के लोगों का वहां रहना बेहद मुश्किल काम है. यह सभी लोग अब केवल शासन की मदद के आसरें हैं. दरअसल, बांध के रिसाव के संबंध में पिछले 2 वर्षों से ग्रामीण जन लगातार संबंधित इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों को बता रहे थे. इस संबंध में वीडियो भी वायरल हुए लेकिन अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया. कई अधिकारियों ने तो शिकायतकर्ता को ही फटकार कर भगा दिया . नतीजा यह रहा कि लगातार हुई वर्षा के कारण बांध में आवश्यकता से अधिक पानी भर गया और बांध रिसने लगा. जब बांध रिसने लगा तो हडक़ंप मच गया. पहले बांध को रिपेयर करने की कोशिशें हुई, लेकिन जब ऐसा लगा कि मरम्मत करना संभव नहीं है तो फिर प्रशासन ने पानी के लिए रास्ता बनाना प्रारंभ किया. 3 दिन की लगातार कोशिशों के बाद पानी को रास्ता दिया गया और बांध खाली किया गया. इस डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज के कारण कोई जनहानि तो नहीं हुई लेकिन 18 गांव के लोगों को लगभग उजाड़ दिया. उनकी स्थिति बेहद खराब हो गई है. इस बांध को लेकर शुरू से ही विवाद रहे हैं. 2 वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश में जो 3,000 करोड़ का ई टेंडर घोटाला सामने आया था, उसमें इस बांध का मामला भी था. यह भी पता चला है कि इस बांध के बारे में केंद्रीय जल आयोग से अनुमति नहीं ली गई थी. देश में कहीं भी बांध बनाने से पहले केंद्रीय जल आयोग को सूचना देनी होती है और वहां से एनओसी मिलने के बाद बांध बनाया जा सकता है. इस बांध के बारे में ऐसा नहीं किया गया. बांध बनाते समय भारी लापरवाही और भ्रष्टाचार किया गया. जिम्मेदार अधिकारी और इंजीनियर मिलीभगत के कारण आंख मूंदे रहे. नतीजे में यह नौबत आई है. इस संबंध में प्रदेश शासन ने तीन अफसरों और एक वैज्ञानिक तथा तकनीकी विशेषज्ञ के साथ मिलकर जांच कमेटी बनाई है, जिसने जांच प्रारंभ कर दी है. जांच के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा कि इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन हैं? अतीत का अनुभव है कि इस तरह की जांच समितियों की रिपोर्ट के बारे में कम ही जानकारी मिलती है. इस तरह के भ्रष्टाचार के मामले में दोषियों पर कम ही कार्रवाई होती है जिसके कारण इस तरह की लापरवाही लगातार चलती रहती है. यह सब बंद होना चाहिए. दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी ऐसी अपेक्षा है. यह भी मांग की जा रही है कि बांध से पानी खाली करने के कारण जो पैसा खर्च हुआ वह जिम्मेदार अधिकारियों और इंजीनियरों से वसूला जाना चाहिए ? यदि ऐसा करना संभव हो तो अवश्य किया जाना चाहिए. ठेकेदार कंपनी को भी काली सूची में डाल कर कंपनी के मालिकों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करने की आवश्यकता है. अभी तक जो भी कार्रवाई हुई है उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता. ऐसा लगता है कि अधिकारीगण लीपापोती करने में व्यस्त हैं. प्रथम दृष्टया इस लापरवाही के जिम्मेदार इंजीनियरों को कम से कम निलंबित तो किया ही जा सकता है! कुल मिलाकर सरकारी तंत्र ने एक बार फिर जाहिर किया कि उसके निर्मम भ्रष्टाचार से जनता को कितना नुकसान हो सकता है! आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारी नौकरशाही के ढर्रे में सुधार नहीं आया है. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादाई है. मामले की जांच जल्दी से जल्दी की जानी चाहिए और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए. इसके अलावा प्रभावित लोगों को इतना मुआवजा दिया जाना चाहिए कि वे फिर से अपनी आजीविका चला सकें.

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