रेवड़ी कल्चर को कैसे रोकें ?

केंद्र और राज्य सरकारों की मुफ्त सरकारी योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की है. खास तौर पर चुनाव से पहले किए जाने वाले मुफ्त योजनाओं के वादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अहम टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनाव प्रचार के दौरान ‘मुफ्त रेवड़ी’ बांटने के वादे एक गंभीर आर्थिक समस्या है.इस समस्या से निपटने के लिए एक संस्था की जरूरत है. सप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर चुनाव आयोग और सरकार के साथ नेता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से भी सुझाव मांगे हैं. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें मांग की गई है कि मुफ्त रेवड़ी का वादा करने वाली राजनीतिक पार्टियों का निशान सीज कर दिया जाए और उन पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाए.चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी और हिमा कोहली की बेंच ने कहा कि नीति आयोग, वित्त कमीशन, सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और अन्य संस्थाओं को भी इस मामले में सुझाव देने चाहिए कि आखिर इस ‘रेवड़ी कल्चर’ को कैसे रोका जा सकता है. बेंच ने कहा, अच्छे सुझाव के लिए जरूरी है कि जो लोग इस कल्चर का समर्थन करते हैं वे और विरोध करने वाले लोग, दोनों ही सुझाव दें. सुप्रीम कोर्ट ने एक एक्सपर्ट बॉडी बनाने के लिए सात दिनों के अंदर सुझाव मांगे हैं. दरअसल,

मुफ्त की योजनाओं के चुनावी वादों से अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान हो रहा है. लोगों को रिझाने वाले ये वादे न सिर्फ वोटर्स को प्रभावित करते हैं बल्कि अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित करते हैं. इसके लिए कोई एक पार्टी दोषी नहीं है.सभी दल मुफ्त की योजनाओं का वादा करके फायदा उठाते हैं. दरअसल सुप्रीम कोर्ट की रेवडय़िां बांटने वाली राजनीति के खिलाफ टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण और गंभीर है. यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब श्रीलंका भुखमरी के कारण गृह युद्ध के कगार पर है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी चरमरा रही है. ऐसे में भारत को इस तरह की मुफ्त योजनाओं से बचना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, अनेक आर्थिक विशेषज्ञ इस बारे में सावधान कर चुके हैं. खुद प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में इसका उल्लेख किया है. भारत में कुछ राजनीतिक दलों ने अपनी सत्ता वाले राज्यों में मुफ्त बिजली, मुफ्त अनाज, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त चिकित्सा, मुफ्त लैपटॉप, स्मार्टफोन, साइकिलें बांटने जैसे ऐलान किए हैं. इन घोषणाओं से कई हजार करोड़ रुपए का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है. इससे आखिरकार अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए सभी राजनीतिक दलों ने इस बारे में विचार करना चाहिए. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा है कि इसके लिए एक संस्था बनाने की जरूरत है. चुनाव आयोग चाहे तो इस तरह की मुफ्तखोर घोषणाओं को रोक सकता है. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से आशा जगी है कि आने वाले दिनों में इस संबंध में कोई ठोस निर्णय लिया जा सकेगा. जनता और देश हित में ऐसा निर्णय लेना बहुत आवश्यक है।

केंद्र सरकार चाहे तो सर्वदलीय बैठक बुलाकर इस विषय पर सहमति बना सकती है. देश की अर्थव्यवस्था और विकास का मामला हमेशा राजनीति से ऊपर माना जाना चाहिए. इसलिए सभी राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वेशंस का गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए.

नव भारत न्यूज

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