जल्दी निकले संकट का हाल

महाराष्ट्र में पिछले 3 दिनों से हाई वोल्टेज ड्रामा चल रहा है. शिवसेना के 42 विधायकों ने बगावत कर दी हैं. यह सभी विधायक गुवाहाटी के एक पांच सितारा होटल में बंद हैं. महाराष्ट्र में आए इस सियासी भूचाल के कारण शासन और प्रशासन ठप है. महाराष्ट्र में महा विकास आघाडी की सरकार है. जिसमें शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस शामिल हैं. यह सरकार शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में ढाई वर्ष पूर्व गठित हुई थी. जब यह सरकार गठित हुई थी तभी से यह माना जा रहा था कि अंतर्विरोध के चलते यह सरकार अधिक समय तक नहीं चल पाएगी. इसका कारण यह था कि विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन था. भाजपा और शिवसेना गठबंधन को 166 सीट मिली थी. भाजपा और शिवसेना के बीच महाराष्ट्र में लंबे समय से गठबंधन रहा है. दोनों पार्टियों में हिंदुत्व और आर्थिक उदारीकरण को लेकर वैचारिक समानता है.पिछले चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे ने अचानक यह दावा करना प्रारंभ किया कि भाजपा ने शिवसेना को मुख्यमंत्री पद का वादा किया है इसलिए वह मुख्यमंत्री पद शिवसेना को दें. वास्तविक हकीकत यह थी कि 166 में से 106 विधायक भाजपा के थे. जबकि 56 शिवसेना के. चार विधायक भाजपा और शिवसेना के समर्थन से निर्दलीय चुनकर आए थे. यही नहीं चुनाव के दौरान जितनी भी चुनावी सभाएं हुई सभी में भाजपा ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जो पिछली सरकार में भी मुख्यमंत्री थे. भाजपा के विधायकों की संख्या शिवसेना से लगभग दुगनी थी. ऐसे में अचानक उद्धव ठाकरे द्वारा मुख्यमंत्री पद की मांग करना एक तरह से गठबंधन के साथ धोखा देने जैसा था, लेकिन उद्धव ठाकरे ने जिद पकड़ ली और उनके प्रवक्ता संजय राउत दिन में 10 बार केंद्र की भाजपा सरकार और नरेंद्र मोदी के खिलाफ आग उगलते रहे. नतीजा यह हुआ कि भाजपा और शिवसेना को बहुमत मिलने के बावजूद सरकार नहीं बन पाई. कई दिनों तक असमंजस की स्थिति के बाद शरद पवार ने कांग्रेस को मनाया और महा विकास आघाडी का जन्म हुआ. जाहिर है शिवसेना ने जनमत के खिलाफ जाकर कांग्रेस और एनसीपी से गठबंधन किया था. ऐसे में यह गठबंधन पूरी तरह से बेमेल था. बहरहाल, पिछले दिनों हुए राज्यसभा के चुनाव में शिवसेना और विधायकों के क्रॉस वोटिंग हुई नतीजे में भाजपा अपना तीसरा प्रत्याशी जिताने में सफल रही. इसके कुछ दिन बाद ही महाराष्ट्र विधान परिषद के चुनाव हुए थे. जिसमें भी शिवसेना और कांग्रेस में फिर क्रॉस वोटिंग हुई और भाजपा को एक अतिरिक्त प्रत्याशी जीत के रूप में प्राप्त हुआ. विधान परिषद के चुनाव अभी निपटे ही थे कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 32 विधायक सूरत चले गए जहां एक दिन रहने के बाद इन्हें गुवाहाटी शिफ्ट कर दिया गया. बाद में गुवाहाटी में यह संख्या बढक़र 42 हो गई. सबसे बड़ी बात यह है कि उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र जैसे उन्नत राज्य के मुख्यमंत्री है, जहां की पुलिस अत्यंत कार्य कुशल मानी जाती है. महाराष्ट्र और मुंबई पुलिस की तुलना इंग्लैंड की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस से की जाती है. ऐसे में उद्धव ठाकरे को खबर हुए बिना एकनाथ शिंदे द्वारा इतनी बड़ी बगावत करना यह साबित करता है कि उद्धव ठाकरे की प्रशासन पर बिल्कुल पकड़ नहीं थी. उन्हें जानकारी ही नहीं हो पाती थी कि राज्य में क्या हो रहा है. यह शिवसेना, उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र सरकार का बड़ी विफलता थी. दरअसल, उद्धव ठाकरे आमतौर पर बहुत कम नेताओं से मिलते थे. उनके आस-पास चंद नेताओं की चौक?ी निर्मित हो गई थी जो कार्यकर्ताओं और नेताओं को मिलने नहीं देती थी. विधायकों और सांसदों को भी कई दिनों तक इंतजार कराया जाता था. उद्धव ठाकरे की इसी शैली के कारण शिवसेना में बगावत हो गई. इस बगावत कारण महाराष्ट्र में अस्थिरता का वातावरण है. महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक दृष्टि से समृद्ध प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता अच्छी बात नहीं है. इसलिए इस संकट का जल्दी से जल्दी समाधान निकलना चाहिए और जनता को एक सक्षम और प्रभावी सरकार मिलनी चाहिए. वैसे तो जो स्थिति है उसमें उद्धव ठाकरे को अल्पमत में आने के बाद खुद ही इस्तीफा देना चाहिए, लेकिन इतने जतन के बाद मिली सत्ता को इस तरह छोडऩा भी आसान नहीं होता ! जो भी हो इस संकट का जल्द समाधान निकलना चाहिए.

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