वंचित वर्ग में खुशी…

राष्ट्रपति चुनाव के लिए पक्ष और विपक्ष के दोनों गठबंधनों ने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू होंगी. जबकि विपक्ष ने संयुक्त रूप से पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा का नाम तय किया है. द्रौपदी मुर्मू उड़ीसा के सांथाल आदिवासी समाज की हैं. उनकी उम्मीदवारी का असर देश की राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा. देश में 47 लोकसभा सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन दरअसल आदिवासियों का प्रभाव 70 लोकसभा सीटों पर माना जाता है. आदिवासी मुख्य रूप से तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में फैले हुए हैं. देश के 150 जिलों में आदिवासियों का प्रभाव है. पहली बार किसी आदिवासी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है. जबकि प्रतिभा पाटिल के बाद द्रोपदी मुर्मू दूसरी ऐसी महिला प्रत्याशी हैं, जिन्हें सत्तारूढ़ गठबंधन ने देश के सर्वोच्च पद पर चुनाव लड़ाने का फैसला किया है. इससे आदिवासियों और महिलाओं में अच्छा संदेश गया है. द्रोपदी मुर्मू उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्र से आती हैं. इस कारण से उनको नवीन पटनायक के बीजू जनता दल का समर्थन मिलना लगभग तय है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी आदिवासी महिला के खिलाफ जाने की स्थिति में नहीं हैं. इसलिए उन्हें भी मन मार कर द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करना पड़ेगा. जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने अतीत में कई बार एनडीए सरकार का संसद में समर्थन किया है. इसलिए वाईएसआर कांग्रेस का समर्थन भी भाजपा को मिल सकता है. महाराष्ट्र के ताजा घटनाक्रम के बाद राष्ट्रपति पद के निर्वाचक मंडल में भाजपा की स्थिति और मजबूत हुई है. इसलिए माना जा रहा है कि द्रौपदी मुर्मू देश की अगले राष्ट्रपति होंगी. उनका मुकाबला यशवंत सिन्हा से होगा जो अभी तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. यशवंत सिन्हा भी झारखंड से आते हैं, लेकिन वे कायस्थ समुदाय से हैं. द्रौपदी मुरमू को प्रत्याशी बनाने से भाजपा को गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के अलावा झारखंड के आने वाले चुनावों में सीधा लाभ होगा. झारखंड और छत्तीसगढ़ में 50 फ़ीसदी से अधिक आदिवासी आबादी है. गुजरात और मध्य प्रदेश में भी आदिवासियों की निर्णायक संख्या है.ऐसे में भाजपा खुद को आदिवासियों की हितेषी पार्टी कह सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आदिवासियों पर लगातार फोकस कर रहे हैं. बहरहाल,उड़ीसा की आदिवासी समाज की नेता द्रोपदी मुर्मू अत्यंत निर्धन परिवार से संघर्ष करके ऊपर आई हैं. वे शिक्षिका थी. 1997 में उन्हें पार्षद के लिए टिकट दिया गया. द्रौपदी मुर्मू उड़ीसा से भाजपा की विधायक रही हैं तथा उन्होंने अनेक बार संगठन के पद भी संभाले हैं.वे उड़ीसा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रही हैं. 2015 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया था. अत्यंत परिश्रमी और ईमानदार नेता की छवि के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भरोसा उन पर हमेशा से रहा है. इस तरह के प्रत्याशी चयन से लोकतंत्र मजबूत होता है. अतीत में केआर नारायणन और एपीजे अब्दुल कलाम ऐसे राष्ट्रपति रहे हैं जिन्होंने कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल में अध्ययन किया है और लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ाई की है. यह भारतीय लोकतंत्र की महिमा और उसकी विशेषता है कि यहां गरीब तबके के व्यक्ति को भी देश का सर्वोच्च पद मिल सकता है. जाहिर है द्रोपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से वंचित वर्ग में खुशी है.

 

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