बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे गिधौहा गांव के सैकड़ों आदिवासी परिवार

75 वर्षों बाद भी नहीं पहुंची बिजली, सड़क जनप्रतिनिधियों के खिलाफा ग्रामीणों में भारी असंतोष पांच किलोमीटर चलने के बाद मिलती है कच्ची-पक्की सड़क

सिंगरौली : चितरंगी ब्लॉक के सबसे दूरस्थ अंचल कोरावल सर्किल के खम्हारडीह ऐसी ग्राम पंचायत है, जहां एक घनी आबादी में बूंद-बूंद पानी के लिए आदिवासी परिवार तरस रहा है। प्यास बुझाने के लिए ग्रामीणों को झरना व दूर-दराज इकलौते हैण्डपम्प से ही लेने के लिए मजबूर हो जा रहे हैं। वहीं गिद्दहवा टोला में आज तक बिजली, सड़क भी नहीं पहुंची है। इस बात को लेकर यहां के आदिवासी परिवारों में शासन-प्रशासन के खिलाफ भारी नाराजगी है।

दरअसल चितरंगी ब्लॉक में सबसे दूर्गम व दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र कैमोर के के अभ्यारण्य बगदरा अंतर्गत राजस्व मण्डल क्षेत्र कोरावल के खम्हारडीह पंचायत अंतर्गत गिद्दहवा गांव की आबादी तकरीबन 2000 है। यहां पर 80 फीसदी से ऊपर आदिवासी गोंड समाज के लोग लगभग सात दशक से निवासरत हैं। हैरानी की बात है कि इस गांव में शुद्ध पेयजल के लिए तरसना पड़ रहा है। झरने से ही अधिकांश लोग अपनी प्यास बुझाते हैं। स्वयं के व्यय से एकाध हैण्डपम्पों का उत्खनन कराय गया है, लेकिन वह उसका पानी इन दिनों दूषित है। जिसके चलते यहां संक्रमण बीमारी उल्टी, दस्ता, कालरा जैसी महामारी फैलने की संभावना लगातार बनी रहती है।

अभी यहां कालरा जैसी बीमारी फैली हुई है, मौके पर स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंच शिविर के माध्यम से बीमार लोगों का समुचित ईलाज किया जा रहा है। यहां कि भोले-भाले आदिवासी, वयोवृद्ध जगपथ सिंह गोंड बताते हैं कि आज मेरी उम्र करीब 75 वर्ष हो चुकी है, शुद्ध पानी, बिजली के लिए तरस रहे हैं। विधानसभा, लोकसभा चुनाव के वक्त लोग बहुत कुछ आश्वासन देकर चले जाते हैं, लेकिन वह आश्वासन अभी तक कोरा साबित हुआ है।

कई बार नेताओं से भी मिलकर समस्याओं का निदान कराने के लिए आग्रह किया फिर भी स्थिति यथावत है। इस भीषण गर्मी के चलते यहां के शत-प्रतिशत जल स्रोत सुख गये हैं। इन दिनों बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ रहा है, पूरे आबादी में इक्के-दुक्के स्वयं के हैण्डपम्प, सैकड़ों लोगों की प्यास बुझा रहे हैं, उसके लिए 2-3 किलोमीटर दूरी सफर तय करने एवं लम्बी कतार लगने के बाद बाल्टी पर पानी नसीब होता है। बगदरा अंचल के साथ इतना बड़ा सौतेला ब्यौहार शासन-प्रशासन के द्वारा क्यों किया जा रहा है? इस बात को लेकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी है।

पांच किलोमीटर चलने के बाद मिलती है पक्की सड़क
गिधौहा गांव से पंचायत मुख्यालय की दूरी करीब पांच किलोमीटर है, इस पांच किलोमीटर के बीच में पक्की सड़क की बात दूर, कच्ची सड़क मार्ग भी नसीब नहीं है। उबड़-खाबड़ पहाड़ी में लोग स्वयं के व्यय से रास्ता बनाकर किसी तरह पंचायत मुख्यालय आते-जाते रहते हैं। बारिश के समय यह आवागमन भी बंद हो जाता है। इस मार्ग में छोटे-छोटे नाले बरसात में उफान पर आने से बाधक हो जाते हैं। कई बार यहां के ग्रामीण पंचायत के माध्यम से खण्ड व जिला स्तर प्रस्ताव भी भिजवाया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों की उदासीनता का खामियाजा यहां के ग्रामीण भुगत रहे हैं। यह खामियाजा कब तक भुगतेंगे इस पर अभी कुछ कह पाना मुश्किल है। शासन-प्रशासन के रवैया से प्रतीत हो रहा है कि यहां अभी भी विकास कोषों दूर है।

गांव में बिजली तक नसीब नहीं!
केन्द्र सरकार की अति महत्वाकांक्षी सौभाग्य योजना सहित इसके पहले राजीव गांधी विद्युतीकरण व प्रदेश सरकार की कई योजनायें आई। योजनाओं के आते ही, यही ऐलान किया जाता रहा कि कोई भी गांव, टोला, बस्ती बिजली से वंचित नहीं रहेगा। एक-एक घर में बिजली पहुंचेगी, इसके बावजूद गिधौहा ऐसा गांव है, जहां आज तक बिजली की रौशनी नहीं पहुंची है। गांव के युवा व बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि यहां कोई सर्वे करने भी नहीं आया, जिसके कारण सैकड़ों घरों में बिजली के लिए लोग तरस रहे हैं।

विकास में अभ्यारण्य बना है रोड़ा!
कोरावल सर्किल के विकास में सबसे बड़ा बाधक संजय राष्ट्रीय उद्यान अभ्यारण्य बगदरा बना हुआ है। क्षेत्रफल के अनुसार तकरीबन 20-25 फीसदी जंगल है, किन्तु पूरे कोरावल सर्किल को अभ्यारण्य घोषित है। ऐसे में यदि ग्राम पंचायत व अन्य निर्माण एजेंसी कार्य करना भी चाहती है, तो सबसे पहले अभ्यारण्य अमले के यहां मिन्नत करनी पड़ती है। यदि अभ्यारण्य अमला खुश नहीं हुआ तो विकास कार्यों में रोड़ा डालना उसकी फितरत है। बगदरा क्षेत्र के ऐसे कई निर्माण व विकास कार्य में अभ्यारण्य बगदरा रोड़ा डाले हुए है। प्रस्तावित सिंचाई बांध बेलदरा सबसे बड़ा उदाहरण है। लोगों का कहना है कि जहां जंगल नहीं है, वहां से अभ्यारण्य प्रतिबंध हटाये ताकि इस अंचल का समुचित विकास हो सके ।

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