निकाय चुनाव में ऐसी बगावत पहले कभी नहीं हुई

ग्वालियर- चंबल डायरी
हरीश दुबे
ग्वालियर चंबल में नगरीय निकाय के चुनाव में टिकट वितरण को लेकर दोनों दलों कांग्रेस एवं भाजपा में इस बार जिस कदर महाभारत मचा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ है। आम तौर पर कुछ अपवाद छोड़कर दोनों दलों के नेता और टिकटार्थी पार्टी नेतृत्व द्वारा फाइनल की जाने वाली सूची को शिरोधार्य कर चुनाव अभियान में जुट जाते हैं, लेकिन टिकट वितरण के बाद दोनों दलों में इस दफ़ा जिस तरह का घमासान मचा, उसने ग्वालियर के चुनावी इतिहास में कुछ ऐसे नए अध्याय जोड़ दिए हैं जो भविष्य के चुनावों के लिए नसीहत का काम करेंगे। लगभग हर वार्ड में भाजपा और कांग्रेस के बागियों ने ताल ठोक अपने नेतृत्व को मुसीबत में डाल दिया है। आज चूंकि नाम वापसी की आखिरी तारीख थी लिहाजा दोनों दलों की डैमेज कंट्रोल टीम और डिजास्टर  मैनेजमेंट के लोग बागियों को पकड़ पकड़ कर उनके पर्चे वापस कराते रहे।उधर कांग्रेस में शहर सदर देवेंद्र शर्मा और सुनील शर्मा के इस्तीफों से उपजा बवाल कमलनाथ के इस स्पष्ट संकेत के बाद थम गया है कि अब किसी भी वार्ड में प्रत्याशी नहीं बदला जाएगा।
चयन कमेटी के चेयरमैन बनकर फंस गए सांसद
 दो बार महापौर और जीडीए के चेयरमैन रह चुके ग्वालियर के सांसद अनुभवी राजनीतिज्ञ तो हैं लेकिन उनकी इमेज राजनीति के चतुर खिलाड़ी की कभी नहीं रही। अल्पभाषी, शांत-संयत रहना उनकी पहचान है। सियासत के झगड़े टन्टों से दूर ही रहते हैं लेकिन यह निगम चुनाव उनके लिए कटु अनुभव वाला साबित हो रहा है। यही वजह है कि टिकट से वंचित भाजपाईयों का सर्वाधिक कोपभाजन उन्हें ही बनना पड़ा है। दरअसल, सांसद शेजवलकर को पार्टी ने निकाय चुनाव के लिए टिकट तय करने वाली संभागीय चयन समिति का संयोजक बनाया था, यही उनके लिए मुसीबत बन गया। कुछ नेताओं ने टिकट बंटवारे का सारा ठीकरा उनके सिर फोड़ दिया और प्रत्याशियों की लिस्ट जारी होने के बाद से ही सांसद महोदय बागियों के घेराव, प्रदर्शन और नारेबाजी में फंसे हुए हैं। कभी बागी उनकी कार के आगे लेट जाते हैं तो कभी होटल में घेरकर खरी खोटी सुनाते हैं, कभी मुखर्जी भवन में घेरा डाल देते हैं। सांसद कह चुके हैं कि चयन कमेटी के चेयरमैन के हाथ में ज्यादा कुछ नहीं होता है लेकिन उनकी लाख सफाइयां अब तक बेअसर हैं। बागियों के घेराव में सांसदजी के फंसने के बाद चयन कमेटी के दीगर सदस्य भी अपने लिए सुरक्षित कोना तलाश रहे हैं।
और बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया…
  भाजपा में कांग्रेस के टिकट का फैसला भाजपा के पूर्व सांसद की सिफारिश से हो तो सवाल उठना और हंगामा बरपना लाजिमी है। वार्ड ३६  में तमाम अन्य कद्दावर चेहरों को हाशिए पर रखकर जब परिणिता कदम को टिकट से नवाजा गया तो टिकटवंचित वर्ग की ओर से जुमला उछाला गया कि यह टिकट आईएएस से राजनेता बने भाजपा के उन्हीं पूर्व साँसद की सिफारिश से मिला है जो आठ साल पहले भिंड से साँसदी का टिकट मिलने के बावजूद कांग्रेस को धोखा देकर भाजपा से टिकट ले आए थे। लेकिन इससे पहले कि उनकी  कथित सिफारिश से इस निगम चुनाव में वार्ड से उम्मीदवार बनाईं गईं उम्मीदवार का विरोध परवान चढ़ता, नामांकन
 पत्रों की जांच में उनका पर्चा  ही खारिज हो गया। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का जश्न मना रहे इस वार्ड के कांग्रेस के बागी उम्मीदवार अब निश्चिंत हैं कि मजबूरी में ही सही, पार्टी उन्हें यह कटा हुआ टिकट देगी ही।
  पहले टिकट काटा और अब की जा रही मान-मनुहार
 वार्ड छह में कांग्रेस ने कई महीनों से चुनाव की तैयारी में जुटे दीपक मांझी का टिकट यह कहते हुए काट दिया था कि वे कभी न जीतने वाले शेर हैं लेकिन आज वही पार्टी उनके पीछे टिकट लेकर घूम रही है और अब वे टिकट ले नहीं रहे। दअरसल,  यहां कांग्रेस ने जिस चेहरे पर दांव खेला था, उनका नामांकन पत्र ही खारिज हो गया, इस तरह यह वार्ड अब रिक्त है। अब यहां कांग्रेस के पास दीपक मांझी को अपना प्रत्याशी बनाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है लेकिन निर्दलीय लड़ने का मन बना चुके दीपक मांझी पार्टी से पूरा हिसाब चुकता कर लेना चाहते हैं। दीपक मांझी को टिकट देने की सिफारिश कांग्रेस के ऐसे प्रदेश महामंत्री ने की थी जिनकी दस जनपथ से सीधी लिंक राजनीति के गलियारों में चर्चित रहती है लेकिन इस सिफारिश को भी रद्दीखाते में डाल दिया गया था।  कांग्रेस के नेता दीपक मांझी के गुस्से को जायज मानते हुए इस उम्मीद से है कि उक्त वार्ड में मांझी ही कांग्रेस की नैया पार लगाएंगे।

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