महापौर की आसन्दी पर तीसरी बार बैठेगी महिला

अरुणा सैन्या ने देश की पहली दलित महिला महापौर बनकर इतिहास रचा तो राजनीतिक विरासत वालीं समीक्षा गुप्ता भी रह चुकी हैं प्रथम नागरिक
हरीश दुबे
ग्वालियर: ग्वालियर नगर निगम में महापौर का पद करीब दो वर्ष पहले महिला सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित किया गया था और इसमें कोई तब्दीली नहीं की गई है। दोनों ही मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा की नेत्रियों के साथ ही ग्वालियर के उन बड़े सियासी कुनबों की ओर से भी दावेदारी तेज हो गई है जो मौके में चौका मारने की गरज से राजनीति से अब तक ताल्लुक न रखने वालीं अपने परिवार की महिलाओं के नाम प्रमोट करने में जुटे हैं।ग्वालियर निगम के महापौर चुनाव के इतिहास में यह तीसरी बार होगा जब एक महिला महापौर बनेगी। ९४ में भाजपा की स्व. अरुणा सैन्या न सिर्फ ग्वालियर की बल्कि देश की पहली दलित महिला महापौर बनी थीं। वे अत्यन्त साधारण परिवार की थीं और महापौर बनने के बाद ही शहर ने उन्हें जाना।

उनकी सादगी का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे जिस वक्त महापौर पद की शपथ ले रहीं थीं, उनके पिता महापौर कार्यालय के एक उद्यान में ही ड्यूटी कर रहे थे। सुश्री सैन्या ने ग्वालियर निगम के इतिहास में पहली बार 648 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हीं के कार्यकाल में ग्वालियर में पहली बार देश के महापौरों का राष्ट्रीय अधिवेशन भी हुआ था। इसके बाद भाजपा की ही समीक्षा गुप्ता २००९ में महापौर बनीं। उन्हें नगर की प्रथम नागरिक की आसन्दी तक पहुँचने में ग्वालियर निगम में कई दफा पार्षद रह चुके नामचीन भाजपा नेता नरेश गुप्ता की पुत्रवधु होने का लाभ तो मिला लेकिन समीक्षा ने महापौर बनने के बाद अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में ग्वालियर को विकास का नया चेहरा देकर राजनीतिक पटल पर अपनी खुद की पहचान सृजित की। इसके बाद अब २०२२ में यह तीसरा बार होगा जबकि प्रथम नागरिक की सीट पर एक महिला विराजेंगी।
1965 में विष्णु भागवत थे कांग्रेस के आखिरी महापौर
ग्वालियर निगम में महापौर के चुनाव में कांग्रेस पर भाजपा हर बार भारी रही है, भले ही परिषद में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस के ज्यादा पार्षद जीतकर आए हों। बहरहाल, 1965 में विष्णु माधव भागवत आखिरी कांग्रेसी महापौर थे। इसके बाद से अभी तक कांग्रेस का कोई भी महापौर नहीं बन सका है। विष्णु भागवत से पहले डाॅ. पापरीकर व चिमनभाई मोदी कांग्रेस के महापौर रहे थे।
विधायक रहने के बाद पार्षदी का चुनाव लड़ा पलैया ने…
ग्वालियर नगर निगम में महापौर चुनने की परंपरा 1956 में शुरु हुई थी।महापौर का कार्यकाल पहले एक साल का होता था। 1956 से 1987 तक एक साल का कार्यकाल रहा। उसके बाद 5 साल का कार्यकाल रहने लगा। उस वक्त महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होता था। जिसके तहत हाउस के भीतर पार्षद बहुमत के आधार पर महापौर का चुनाव करते थे। 2000 में इसमें बदलाव हुआ और ग्वालियर की जनता को प्रत्यक्ष तौर पर सीधे मतदान कर महापौर चुनने का अधिकार मिला। तब भाजपा के पूरन सिंह पलैया महापौर चुने गए थे। वे इससे पहले भांडेर से विधायक रह चुके थे।

दिलचस्प बात यह कि विधायक रहने के बाद उन्होंने पार्षदी का चुनाव लड़ा।कांग्रेस ने कर दी थी अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लेकिन भाजपा ने किया जस का तसकांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने 2019 में महापौर के चुनाव की प्रक्रिया में बदलाव करते हुए प्रत्यक्ष के बजाए अप्रत्यक्ष प्रणाली कर दी थी जिसका विरोध हुआ लेकिन कांग्रेस अपने निर्णय पर अटल रही। लेकिन अब भाजपा शासन में फिर से महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष पद्धति से कर दिया गया है।

पहली निगम, जहाँ पिता-पुत्र महापौर रहे, अब तीसरी पीढी़ स्पर्धा मेंग्वालियर नगर निगम संभवत: देश की ऐसी पहली नगर निगम है, जहाँ पिता और पुत्र दोनों महापौर रहे हैं और इन पिता – पुत्र को महापौर पद पर बैठने के बाद ग्वालियर का सांसद बनने का भी मौका मिला। स्व. नारायण कृष्ण शेजवलकर जहां तीन बार महापौर रहे तो वहीं उनके पुत्र विवेक नारायण शेजवलकर दो बार 2005 से 2010 और 2015 से 2019 तक महापौर रहे। नारायण कृष्ण शेजवलकर के बारे में एक किस्सा मशहूर है, उन्होंने शर्त रख दी थी कि जिस दिन एक भी पार्षद उनके प्रति अविश्वास जताएगा, वे उसी दिन इस्तीफा दे देंगे, और वाकई उन्होंने ऐसा कर दिखाया भी था। इस परिवार की तीसरी पीढी़ अब महापौर के टिकट की स्पर्धा में बताई गई है।

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