सभी अनाथ बच्चों को संरक्षण मिले

कोरोना संक्रमण के दौरान जिन बच्चों के माता और पिता दिवंगत हो चुके हैं उन्हें प्रधानमंत्री चाइल्ड केयर फंड से दस,दस लाख रुपए की राशि दी गई है. ऐसे बच्चों की शिक्षा और लालन-पालन की व्यवस्था भी सरकार की ओर से की जा रही है. प्रदेश सरकार ने भी अपनी ओर से ऐसे बच्चों के लिए अनेक घोषणाएं की हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इस कदम की प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन देश में अनाथ बच्चों की जो स्थिति है और जो संख्या है उसको देखते हुए सभी ऐसे बच्चों को संरक्षण मिलना चाहिए जिन्होंने अपने माता और पिता को खोया है. जाहिर है इस योजना को व्यापक बनाने की आवश्यकता है. हमारे देश की सरकारों ने बच्चों के लिए जितने प्रयास करने चाहिए थे उतने नहीं किए हैं. इस कारण से चाइल्ड केयर के मामले में भारत दुनिया भर के देशों में अंतिम से 16 वे नंबर पर है. बच्चे देश का भविष्य होते हैं, इस कारण से उनकी शिक्षा और पौष्टिक भोजन की जवाबदारी सरकार ने उठानी चाहिए. अभी जो कुछ प्रयास हो रहे हैं उसमें सरकार की भागीदारी कम है. अनाथ बच्चों के लिए सामाजिक और गैर सरकारी संगठन अधिक काम कर रहे हैं. इस स्थिति को बदले जाने की आवश्यकता है. दरअसल, प्रगति के लंबे-चौड़े दावों के बावजूद भारत में बच्चों की स्थिति दयनीय बनी हुई है. भारत में हर साल अकेले कुपोषण से 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. कोई 10 करोड़ बच्चों को अब तक स्कूल जाना नसीब नहीं है. इसके साथ ही सामाजिक और नैतिक समर्थन के अभाव में स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. इसके अलावा खासकर बढ़ते एकल परिवारों की वजह से ऐसे बच्चे साइबर बुलिंग का भी शिकार हो रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक चार साल तक के बच्चों की वैश्विक आबादी का लगभग 20 फीसदी भारत में ही है. देश में हजारों बच्चों को गरीबी और गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के चलते स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं होता तो कइयों को मजबूरी में स्कूल छोडऩा पड़ता है. सरकारी आंकड़े कहते हैं कि हर सौ में महज 32 बच्चे ही स्कूली शिक्षा पूरी कर पाते हैं. देश में बाल मजदूरी की समस्या भी बेहद गंभीर है. दो साल पहले बच्चों के लिए काम करने वाली एक सामाजिक संस्था ने कहा था कि देश में बाल मजदूरी खत्म होने में कम से कम सौ साल का समय लगेगा. बाल मजदूरी करने वाले अधिकांश बच्चे अनाथ और निर्धन हैं. देश में ऐसे बच्चों की तादाद भी बहुत है जिन्हें नशे की आदत लग गई है. 8 से 14 वर्ष के ऐसे बच्चों की संख्या लाखों में है. बच्चों के साथ यौन शोषण और अत्याचार के मामले की पिछले दशक में बढ़ें हैं. इसका कारण बेरोजगारी और गरीबी से उभरी हताशा और निराशा है. आर्थिक समस्याओं के कारण तनाव के चलते लोग बच्चों पर अत्याचार कर अपनी भड़ास निकालते हैं. जाहिर है भारत में बच्चों के विकास के लिए समग्र प्रयास किए जाने की आवश्यकता है. ऐसे में केवल कोरोना संक्रमण के कारण अनाथ हुए बच्चों पर ध्यान देने से काम नहीं चलेगा. केंद्र और राज्य सरकारों को इस संबंध में ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है. सरकार सामाजिक संगठनों के साथ साथ कारपोरेट जगत से भी मदद ले सकती है. जब तक बच्चों को पौष्टिक भोजन और शिक्षा के अवसर नहीं मिलेंगे तब तक देश का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है. सरकारों के साथ ही बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी सभी देशवासियों की है. उनका बचपन जीवित रहे तथा वे स्वस्थ और सकारात्मक माहौल में रहें यह जरूरी है. फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए.

नव भारत न्यूज

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