खंडवा में भी चल रहीं दिल्ली जैसी मौत बांटने वाली फैक्टरियाँ?

खंडवा: कारखाने मौत घडऩे वाले भी होते हैं। ठीक दिल्ली के उस अग्निकांड की तरह जहां रहवासी इलाके में फैक्टरी से मौत 27 लोगों को उठाकर ले गई। खंडवा निगम सीमा के अंदर ऐसे सौ से ज्यादा कारखाने हैं, जो निगमायुक्त और कलेक्टर को नहीं पता। इसीलिए करोड़ों का इंडस्ट्रियल एरिया खाली पड़ा है। घरों और गली-मोहल्लों में कारखाने चल रहे हैं।कईयों को तो नगर निगम ने प्रमाणपत्र भी बांट दिए। इनमें काम करने वालों की लेबर विभाग के पास डिटेल है। न ही नगर निगम के फायर ब्रिगेड, अन्य लायसेंस हैं। निगमायुक्त तहकीकात करें तो उनके ही कर्मी व कुछ अफसर बने फिरने वालों की पोल खुल सकती है। खंडवा में हर तरह के हादसे पहले हो चुके हैं। फिर भी निगम के कुछ कर्मी व नेता संरक्षक बने हुए हैं। इन पर जिला प्रशासन व निगम की संयुक्त कार्रवाई जरूरी हो गई है।
इन पर कार्रवाई कब?
शहर में दर्जनों ऐसे उद्योग खुल गए हैं,जो गैरकानूनी ढंग से संचालित हो रहे हैं। इन पर लगाम कसने के लिए अब तक कोई बड़ी मुहिम संबंधित अधिकारियों द्वारा नहीं चलाई गई। यही कारण है कि इनकी संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। गोली-बिस्किट से लेकर पान सुपारी और भी अन्य तरह बड़े लोहे के कारखाने शहर की तंग गलियों में चल रहे हैं। टायर रिमोल्डिंग तो खतरनाक प्रक्रिया से हो रहा है। किसी भी दिन दर्जनों मौतें एकसाथ होने का खतरा मंडरा रहा है।
रोजगार नहीं बीमारी बाँट रहे
यहां निर्मित होने वाले पदार्थों की गुणवत्ता भी मानकस्तर की नहीं होती। यही नहीं इन कारखानों से निकलने वाला जानलेवा धुआं लोगों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। यहां के रहवासियों की मानें तो एलर्जी, सर्दी-जुखाम और दम की बीमारी धीरे-धीरे इन्हें अपनी आगोश में ले रही हैं। इतना गंभीर मुद्दा होने के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई सवालों को जन्म दे रही है।
बाल मजदूरी भी बेखौफ
कुछ स्थानों पर तो मासूम बच्चों से भी यहां काम लिया जा रहा है। यह बाल मजदूरी की श्रेणी में आता है। ऐसा नहीं कि इसकी जानकारी संबंधित आला अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को नहीं है। यह सब काम इन्हीं की शह पर बे-रोकटोक जारी है। गुलमोहर कालोनी, इमलीपुरा, कहारवाड़ी,माता चौक, घासपुरा, सिंधी कॉलोनी, जबरन कॉलोनी, गुलशन नगर,खानशाहवली,इंदौर नाका, क्षेत्र सहित कई ऐसे स्थान हैं,जहां उद्योग धंधों के संचालन से लोगों की जान पर बन आई है।
अवैध कामों में बिजली क्यों दी?
सवाल तो यह उठता है कि रहवासी इलाकों में अवैध रूप से उद्योग धंधों के संचालन के लिए विद्युत विभाग द्वारा कनेक्शन ही क्यों दिया जाता है? अधिकारियों को उनके हिस्से की मोटी रकम देकर संचालक बे-खौफ हो जाते हैं।
शहरभर का मुआयना किया जाए तो सारी हकीकत सामने आ सकती है। कई उद्योग धंधे ऐसे हैं, जो वर्षों से संचालित हो रहे हैं। कुछ मामले ऐसे जरूर सामने आए हैं,जिनमें कार्रवाई तो हुई, लेकिन यह कार्रवाई खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में कमी को लेकर की गई।
शहर के बीच कारखाने बंद हों
नियमों के तहत ऐसे अवैध उद्योग धंधे बंद करने की कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर क्या वजह है कि ऐसे लोगों को प्रश्रय देने में नगरनिगम का स्वास्थ्य विभाग भी लगा है? शहर की तंग गलियों में वैल्डिंग और अलमारी बनाने के कारखानों की संख्या बढ़ती जा रही है। नियमानुसार शहर की सीमा से बाहर इंडस्ट्रीयल इलाके में ऐसी कारखाने संचालित होने चाहिए,लेकिन लोगों के स्वास्थ्य की किसे फिक्र है? विशेषज्ञों की मानें तो वैल्डिंग और अलमारियों पर किया जाने वाला स्पे्र कलर लोगों स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। इनसे गंभीर बीमारियां जैसे अस्थमा और टीबी जैसे रोगों का शिकार लोग हो सकते हैं।
ये कारखाने आमजन के स्वास्थ्य पर विपरित असर डाल रहे हैं। कारखाने रोजगार कम और टीबी-दमा जैसी घातक बीमारियों परोस रहे हैं। इससे मौत का भी खतरा मंडरा रहा है। पिछले साल देश में टीबी से कई लोगों की मौतें हुई हैं। 2024 तक देश से टीबी को खत्म करना है। ऐसे कारखाने शहर के बीच में चलते रहे,तो कैसे अभियान सफल होगा? नगर निगम के कुछ अफसरों की सेटिंग के चलते फर्नीचर पर रंग पेंट करने,बेकरी, रिमोल्ड टायर कारखाने,गोली बिस्किट कारखाने,वेल्डिंग सब कुछ हो रहा है। फुग्गों में खतरनाक गैस भरने तक की खंडवा में व्यवस्था है। पहले ऐसा सिलेंडर फटने के एक व्यक्ति के चीथड़े उड़ चुके हैं। औद्योगिक एरिया इसीलिए खाली पड़े हैं। इंदौर नाका और रूधी दोनों जगह कारखाने इसीलिए नहीं लग पाए।

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