अनावश्यक विवादों से बचें

जहां देश में समस्याओं का अंबार है वहां कतिपय लोग कतिपय विवादों को महत्व देने में लगे हुए हैं. हाल ही में चार धार्मिक स्थानों को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई. ताजमहल और लाल किले को लेकर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई. काशी की ज्ञानवापी मस्जिद, जो विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित है, वहां अदालत के आदेश के बाद सर्वे कार्य चल रहा है. इसी तरह मथुरा काशी की मस्जिद को लेकर भी याचिका दायर की गई है. वहां हाईकोर्ट ने 4 महीने में जवाब देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को कहा है. मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में नमाज पढऩे का मामला भी अदालत में उठाया गया है. इस संबंध में एक याचिका इंदौर हाई कोर्ट ने स्वीकार की है. इसी तरह कुतुब मीनार में उल्टी लगी गणेश की प्रतिमा को लेकर कहा जा रहा है कि इससे हिंदुओं के आस्था का अपमान हो रहा है. कुछ लोगों ने तो यह भी ऐलान कर दिया कि कुतुबमीनार दरअसल, विष्णु स्तंभ है. लाल किले के बारे में भी कहा जा रहा है कि यह शाहजहां ने नहीं, बल्कि तोमर राजा ने बनवाया था. इसी तरह ताजमहल में बंद कमरे खुलवाने के लिए याचिका दायर की गई थी, जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की और याचिकाकर्ता से कहा कि वह ताजमहल के बारे में पूरी तरह से रिसर्च करके फिर अदालत आएं. जाहिर है इस तरह के विवाद हमारी प्राथमिकता में नहीं होने चाहिए . यह सही है कि मुगल काल में कुछ प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्थलों को तोडऩे और उनके स्थान पर अन्य धार्मिक स्थल बनाने की कोशिशें हुई थी लेकिन चार, पांच या उससे भी अधिक सदी पुरानी इन घटनाओं को आज उकेरने से क्या मिलेगा ? खास तौर पर उस संदर्भ में जब हमारा राष्ट्र का समग्र विकास प्रभावित होता है . ज्ञानवापी मस्जिद में भले ही सर्वे चल रहा हो लेकिन यह जाना मना तथ्य है कि काशी मंदिर में तोडफ़ोड़ औरंगजेब ने की थी. जाहिर है सर्वे से यही बात साबित होनी है. उसी तरह काशी मथुरा के मंदिर के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि वहां औरंगजेब ने हिंदुओं की आस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की थी. इस संबंध में नई पहल से प्रेरणा ली जा सकती है. काशी कॉरिडोर को भव्य रूप से बनाया गया है और इसका निर्माण इस तरह किया गया कि ज्ञानवापी मस्जिद पूरी तरह से गौण हो जाती है. इसी तरीके से काशी मथुरा मंदिर में भी भव्य के कॉरिडोर बनाया जा सकता है. यहां भी बिना किसी पुराने स्ट्रक्चर को हटाए नया निर्माण इस तरह किया जा सकता है कि हिंदुओं की भावनाएं आहत ना हो. ताजमहल को देखने आने वाले सैलानियों को इस बात से बहुत ज्यादा मतलब नहीं होता कि उसका निर्माण किन परिस्थितियों में और किसने किया ! वे तो अप्रतिम सौंदर्य के इस निर्माण को निहारने आते हैं. ताजमहल को देखने प्रतिवर्ष लाखों विदेशी सैलानी आते हैं. इस स्मारक को विश्व के सात अजूबों में शामिल किया गया है. विदेशी सैलानियों के कारण भारत के पर्यटन को नए आयाम मिलते हैं. जाहिर है ताजमहल को विवाद में घसीटने का देश को नुकसान उठाना पड़ सकता है. हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यह देश संविधान के अनुसार चलेगा.संविधान के संरक्षण की जवाबदारी खुद संविधान ने न्यायपालिका को दी है. इसलिए सभी नागरिकों को न्यायपालिका का सम्मान करना ही होगा. साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हम संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार चलें. घड़ी की सुइयों को सदियों पीछे ले जाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला ! इससे केवल सांप्रदायिक तनाव ही बढ़ेगा. अभी देश को एकजुट होकर विकास के पथ पर चलने की आवश्यकता है. इसलिए इस तरह के अनावश्यक विवादों को तूल नहीं देना ही समझदारी है. जो मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं उन्हें न्यायालय के भरोसे छोड़ देना ही उचित है. हम सब को हमारी न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए.

नव भारत न्यूज

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