खतरनाक है रुपए का अवमूल्यन

डॉलर के मुकाबले रुपया सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है.1 डॉलर की कीमत 77.44 रुपये हो गयी. विदेशी बाजारों में अमेरिकी मुद्रा के मजबूत होने और विदेशी पूंजी की सतत निकासी के कारण रुपया डॉलर के मुकाबले 54 पैसे टूटकर रिकॉर्ड निचले स्तर 77.44 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ.रुपए का मूल्य गिरना इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इससे महंगाई बढ़ेगी. दरअसल, डॉलर के मुकाबले रुपए का मूल्य गिरने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा. यह तो सभी जानते हैं कि हम अपनी जरूरत के 80 फ़ीसदी डीजल और पेट्रोल का आयात करते हैं. आयात बिल बढऩे का असर यह होगा कि पेट्रोल और डीजल कंपनियां भाव बढ़ा देंगी. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर सीधे बाजार पर पड़ता है क्योंकि माल ढुलाई महंगी हो जाती है. इस कारण से बाजार की सभी वस्तुएं अपने आप ही महंगी हो जाती हैं. रुपए के मूल्य में गिरावट से विदेशी भंडार में कमी आती है जिसका असर मुद्रास्फीति यानी परोक्ष रूप से महंगाई पर पड़ता है. कुल मिलाकर महंगाई बढऩे से आम जनता ही परेशान होती है, लेकिन केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के पास इससे निपटने के उपाय नहीं है. रुपए के मूल्य में कमी का कारण कच्चे तेल के भाव में वृद्धि और अमेरिकी फेडरल बैंक द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना है. यह दोनों ही स्थितियां ऐसी हैं जिस पर केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक का बस नहीं है. हम केवल आशा ही कर सकते हैं कि बाजार की स्थितियां सुधरेगी और रुपए का मूल्य फिर से बढ़ेगा.

इस स्थिति में सबसे अधिक असर विदेशी निवेश पर पड़ रहा है. दरअसल,अमेरिकी बांड आय बढऩे तथा मुद्रास्फीति को लेकर चिंताओं के कारण निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं. इन परिस्थितियों के बने रहने से वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा और अधिक आक्रामक तरीके से ब्याज दरों में वृद्धि की जा सकती है.नकदी संकट से रुपया पहले से दबाव में है और कच्चे तेल की कीमतें भी एक महीने से बढ़ रही हैं, जिससे रुपया और भी कमजोर हो गया है.बहरहाल,

ऐसा नहीं है कि रुपए का मूल्य गिरने से सिर्फ नुकसान होता है. निर्यात आधारित उद्योगों को इसका लाभ भी मिलता है.
अमेरिकी डॉलर को पूरे विश्व में हर देश द्वारा स्वीकार किया जाता है इसलिए विश्व का 80 फीसदी व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है. जब विदेशी आयातक, भारत से सामान आयात करते हैं तो उन्हें एक डॉलर के बदले ज्यादा रुपये मिलते हैं जिससे वे और अधिक आयात करते हैं और भारत का निर्यात ब?ता है जिससे देश का भुगतान संतुलन सुधरता है. अर्थशास्त्री मानते हैं कि रुपए के मूल्य गिरने का असर विदेशी पर्यटकों पर सकारात्मक पड़ता है. इससे विदेशी पर्यटक उस देश में जाने के लिए प्रेरित होते हैं जहां डॉलर के भाव अधिक होते हैं. इस हिसाब से देश के पर्यटन उद्योग को इसका लाभ मिल सकता है.रूपये में गिरावट का फायदा आईटी-ऑटो सेक्टर को भी हो सकता है. सॉफ्टवेयर सर्विसेज एक्सपोर्ट से आईटी इंडस्ट्री को फायदा होगा क्योंकि उन्हें अब निर्यात करने पर जो डॉलर मिल रहे हैं उनकी वैल्यू दिनों दिन बढती जा रही है.इसके अलावा विदेश में गाडय़िों का निर्यात करने वाली कंपनियों का रेवेन्यू भी बढगा.बहरहाल, डॉलर के मुकाबले रुपए का मूल्य गिरने से नुकसान अधिक है और लाभ कम. इसलिए रुपए का अवमूल्यन भारतीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से खतरनाक संकेत है. इस संबंध में हमें सतर्क रहना होगा. केंद्र और राज्य सरकारों को इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए अपने खर्चों में कटौती करनी होगी. आम जनता को भी बचत करने की आदत को बढ़ाना होगा. राजकोषीय घाटा कम होने से ही मुद्रास्फीति काबू में आएगी अन्यथा महंगाई का बढऩा तय है. जाहिर है आम आदमी के लिए अभी अच्छे दिन दूर हैं.

नव भारत न्यूज

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