होम गार्ड के पास नहीं है खुद का बैरक,परेड ग्राउण्ड

समस्याओं से जूझ रहे होम गार्ड सैनिक, प्रदेश सरकार एवं आलाधिकारियों के रवैये से होम गार्ड सैनिकों में भारी असंतोष

सिंगरौली : सीधी से विभाजित सिंगरौली जिला 14 साल 24 मई को पूराकरने जा रहा है। 14 साल के बाद भी होम गार्डों के पास खुद का बैरक परेड ग्राउण्ड व जिला मुख्यालय शहर में दफ्तर तक भी नसीब नहीं है। होम गार्ड के सैनिक अंतर्राज्यीय बस स्टैण्ड परिसर के यात्री प्रतिक्षालय में आशियाना बनाकर ड्यूटी कर रहे हैं। जिले के नगर सैनिक एक नहीं कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन भोपाल स्तर पर बैठे होम गार्ड के अधिकारी इन समस्याओं को नजरअंदाज कर दे रहे हैं।

दरअसल सिंगरौली जिला गठन के बाद जिले में 165 होमगार्डों जिसमें पीसीव्ही, सीएचएम, हवलदार, नायक, लांस नायक एवं सैनिकों के पद स्वीकृत किये गये। मौजूदा समय में पीसीव्ही के 1, नायक 11, लांस नायक के 12, हवलदार के 3, सीएचएम के 1 एवं सैनिकों के 75 सहित 104 पदों की पूर्ति है। किन्तु इनके सामने सबसे बड़ी समस्या बैरक परेड ग्राउण्ड एवं स्थायी दफ्तर का है। जिला होमगार्ड के पास एक नहीं कई ऐसी मूलभूत समस्या हैं जिसको लेकर जिले के होमगार्ड अमले में प्रदेश सरकार एवं होम गार्ड के आला अफसरों के रवैये से बेहद खफा हैं। जानकारी के मुताबिक होमगार्ड सैनिक, अंतर्राज्यीय बस स्टैण्ड बैढऩ के यात्री प्रतिक्षालय के प्रथम मंजिल में एक साथ कई सैनिक एक ही हाल में ठहरने के लिए मजबूर हैं।

इन्हें आज तक स्थायी आवास भी नसीब नहीं हुआ है। सूत्र बताते हैं कि करीब 6 साल पूर्व पचौर में तकरीबन 11 एकड़ जमीन बैरक एवं परेड ग्राउण्ड के लिए आरक्षित की गयी है। किन्तु बजट के अभाव में परेड ग्राउण्ड बैरक का निर्माण कार्य आरंभ नहीं हो सका है। लिहाजा उक्त भूमि वर्षों से खाली पड़ी हुई है। हैरानी की बात है कि जिला गठन के 14 बसंत पूरा करने के बावजूद स्थायी डिस्ट्रिक्ट कमाण्डेंट की पदस्थापना नहीं हो पायी है। बैसाखी के सहारे जिला होम गार्ड चल रहा है। केवल दो साल तक के लिए एक स्थायी डिस्ट्रिक्ट कमांडेंट मयंक जैन के रूप में मिले थे। इसके पूर्व व बाद से डिस्ट्रिक्ट कमांडेंट का पद खाली पड़ा हुआ है। फिलहाल जिला होम गार्ड स्थायी आवास, दफ्तर, परेड ग्राउण्ड जैसे मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहा है। वहीं इस महंगाई के दौर में पुलिस आरक्षकों के समान सुविधाएं न मिलने से सरकार एवं भोपाल में बैठे विभाग के आकाओं के कार्यप्रणाली से बेहद खफा हैं।

महंगाई की मार से जूझ रहे सैनिक
देश में महंगाई चरमसीमा पर है। यदि सैनिकों की बात मानें तो केवल 25 हजार रूपये महीने में पगार मिलती है और इस महंगाई की दौर में परिवारजनों का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा करा पाना काफी कठिन हो रहा है। इनका आरोप है कि माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर एवं उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली के फैसले को भी प्रदेश सरकार नहीं मान रही है। होम गार्ड के डीजी स्तर के अधिकारियों की रवैया होम गार्डों के प्रति विपरीत है।

माननीय दोनों न्यायालयों से निर्देश है कि नियमित पुलिस आरक्षकों के समान सुविधाएं मुहैया करायी जाय। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को भी होम गार्ड के अधिकारी मानने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं दो महीने के बाध्यकाल का फरमान भी सरकार के द्वारा जारी किया गया है। उनका आरोप है कि नगर सैनिक अपने ड्यूटी के प्रति कतई विमुख नहीं हैं। बाढ़, आगजनी घटना जैसे आपदाओं के समय नगर सैनिक अपनी जान की वगैर परवाह किये कर्तव्य में लग जाते हैं। फिर भी प्रदेश स्तर के अधिकारी सौतेला व्यवहार क्यों कर रहे हैं?

होम गार्ड के पास बजट का संकट
होमगार्ड के पास बजट का संकट है। इस तरह की बातें नगर सैनिकों के बीच चलती रहती है। उन्हें भोपाल स्तर से बता दिया जाता है कि होम गार्ड आर्थिक संकट से जूझ रहा है। जिस कारण से परेड ग्राउण्ड एवं बैरक का निर्माण नहीं हो पा रहा है। जबकि सूत्र बताते हैं कि 36 करोड़ रकम होम गार्ड के डीजी स्तर के अधिकारियों ने खर्च नहीं किया। लिहाजा प्रदेश सरकार को 36 करोड़ रूपये रिटर्न कर दिया। इनके द्वारा यह भी बताया जा रहा है कि उच्च स्तर के अधिकारियों की रवैया तानाशाही पूर्ण है। मनमानी दिशा-निर्देश देते रहते हैं। वे होमगार्ड सैनिकों का भला नहीं चाहते। सरकार को गुमराह करते हैं।

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