टीवी चैनलों पर नकेल

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनलों को हिदायत दी है कि वे अनावश्यक सनसनीखेज खबरें और भ्रामक समाचार ना चलाएं. टीवी चैनलों से कहा गया है कि वे असंसदीय भाषा का उपयोग ना करें. टीआरपी बढ़ाने के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ की होड़ के चक्कर में तथ्यहीन खबरें अपने चैनलों पर ना चलाएं. इस संबंध में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ उदाहरण भी दिए हैं. जिसमें कहा गया कि कुछ चैनलों ने यूक्रेन और रूस के युद्ध के दौरान पुतिन को परमाणु पुतिन टाइटल दिया. जबकि कुछ चैनलों ने तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत की सनसनीखेज हेड लाइन लगातार दिखाई. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दिल्ली के जहांगीर पुरी दंगों के बारे में की गई रिपोर्टिंग पर भी आपत्ति जताई है. दरअसल, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की चिंता किसी हद तक सही भी है. टीवी चैनल टीआरपी के चक्कर में बिना पुष्टि किए खबरें दिखाते हैं. अनावश्यक रूप से सनसनीखेज ढंग से खबरों को दिखाया जाता है.तेज आवाज में चिल्ला चिल्ला कर खबरें पढ़ी जाती हैं. हिंदी के चैनलों में यह बीमारी अधिक है. इस संबंध में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि चैनल नहीं सुधरे तो उन पर कार्रवाई की जा सकती है.

केंद्रीय आईबी मंत्रालय ने जारी एक विस्तृत परामर्श में केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 की धारा 20 के प्रावधानों का पालन करने का आह्वान किया है, जिसमें इसके तहत निर्धारित कार्यक्रम संहिता भी शामिल है दरअसल, मंत्रालय ने पाया है कि हाल के दिनों में कई सैटेलाइट टीवी चैनलों ने घटनाओं और इसके कवरेज को इस तरह से पेश किया है जो अप्रमाणिक, भ्रामक, सनसनीखेज किस्म के हैं. इसके साथ ही ऐसे मीडिया रिपोर्ट्स सामाजिक रूप से अस्वीकार्य भाषा और टिप्पणियों का उपयोग करते हुए पाए गए यूक्रेन-रूस संघर्ष पर रिपोर्टिंग के मामले में मंत्रालय ने पाया है कि चैनल बढ़ाचढ़ाकर हेडलाइन बना रहे हैं.

इसके साथ ही दिल्ली हिंसा के मामले में भी कुछ चैनलों ने सनसनीखेज सुर्खियों और हिंसा के वीडियो प्रसारित किए हैं जिससे समुदायों के बीच सांप्रदायिक घृणा भडक़ सकती हैं और शांति और कानून व्यवस्था बाधित हो सकती है.टीवी चैनल्स देखने से पता चलता है कि अधिकांश चैनल दर्शकों में उन्माद फैलाने का काम करते हैं.कई बार तो ऐसी बेसिर पैर की खबरें होती हैं, जिन्हें प्रिंट मीडिया एक कॉलम में भी नहीं छपता. दंगों और उपद्रव की रिपोर्टिंग के समय प्रिंट मीडिया जितना संयम और सावधानी बरतता है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बिल्कुल इसके उलट है. प्रिंट मीडिया में आज भी दंगों के दौरान हिंदू मुस्लिम की भाषा उपयोग में नहीं लाई जाती. प्रिंट मीडिया उपद्रव की रिपोर्टिंग करते समय दो समुदायों के बीच मारपीट या समुदाय विशेष का हमला इस तरह की भाषा का प्रयोग करता है. आवश्यक पडऩे पर मुस्लिम की जगह अल्पसंख्यक शब्द का उपयोग किया जाता है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स तमाम इथिक्स की धज्जियां उड़ाते हैं. इन पर कोई लगाम नहीं है. स्थिति यह है कि मानसिक डिप्रेशन में शिकार लोगों को डॉक्टर सलाह देते हैं कि वे समाचार देखना बंद कर दें. हृदय रोगियों और रक्तचाप के मरीजों को भी इसी तरह की सलाह दी जाती है. जाहिर है इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की विश्वसनीयता सोशल मीडिया द्वारा प्रसारित खबरों की तरह बिल्कुल रसातल पर पहुंच गई है. यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ लिए दुर्भाग्यपूर्ण हैं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तुरंत समाचार जानने का महत्वपूर्ण साधन है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए लोग सदृश्य तरीके से खबरें देख सकते हैैं. इसलिए इस माध्यम की महत्ता कम नहीं की जा सकती लेकिन इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को मर्यादा में रहना होगा संयमित तरीके से खबरें दिखानी होंगी और बेवजह शोर करना बंद करना होगा. इस संबंध में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जो मुद्दे उठाए हैं उन पर समाचार चैनलों के संपादकों ने गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए.

नव भारत न्यूज

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