पाक : सचेत रहे भारत

आखिरकार इमरान खान भी पाकिस्तान के ऐसे प्रधानमंत्री साबित हुए जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है. एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत रविवार को इमरान खान की पार्टी के डिप्टी स्पीकर ने नेशनल असेंबली में विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिया, इसके तत्काल बाद इमरान खान राष्ट्रपति से मिले और संसद भंग करने की मांग की. राष्ट्रपति ने इस मांग को मंजूर कर लिया और इमरान खान को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिया. अब पाकिस्तान के संविधान के अनुसार 90 दिन के भीतर चुनाव होंगे. विपक्ष ने इस समूची हरकत को असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक दिन के लिए सुनवाई टालते हुए इस मामले को 5 जजों की बेंच को सौंप दिया है. पाकिस्तान के तमाम कानूनी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट इमरान खान की चाल को नाकाम कर सकता है और स्पीकर को फिर से अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने का निर्देश दे सकता है. यदि ऐसा हुआ तो इमरान खान का हारना तय है. उन्हें बहुमत के लिए 172 सांसदों की आवश्यकता है जबकि उनके पास 145 से अधिक सांसद नहीं है. अल्पमत में आने के कारण ही इमरान खान ने अविश्वास प्रस्ताव खारिज करने की चाल चली. पाकिस्तानी संविधान के अनुसार आर्टिकल 5 में यह प्रावधान है कि यदि विदेशी हस्तक्षेप की आशंका हो तो स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर सकता है. डिप्टी स्पीकर ने इसी आर्टिकल का सहारा लेकर अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिया. विदेशी हस्तक्षेप के आरोप को सही साबित करने के लिए इमरान खान ने पिछले सप्ताह अपने राष्ट्र के नाम संदेश में साफ तौर पर अमेरिका का नाम लिया था और कहा था कि अमेरिका ने एक पत्र द्वारा उन्हें हटाए जाने के लिए कहा है. हालांकि अमेरिका ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और कहा कि उसने इस तरह का कोई पत्र नहीं लिखा. यह भी अभूतपूर्व है कि किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री ने साफ तौर पर राष्ट्र के नाम संदेश में किसी देश का नाम लेकर आंतरिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया हो. दुनिया में पहले किसी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया. दरअसल, इमरान खान ने सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा किया, जिससे विदेशी हस्तक्षेप का आरोप साबित हो सके. बहरहाल, गेंद अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. वह मंगलवार को साफ करेगा कि इमरान खान कार्यवाहक प्रधानमंत्री भी रहेंगे या नहीं. पाकिस्तान में संसदीय लोकतंत्र है लेकिन इसे सीमित लोकतंत्र या लिमिटेड डेमोक्रेसी कहा जाता है. इसका कारण यह है कि वहां की वास्तविक शासक सेना होती है. जब तक किसी राजनीतिक नेतृत्व को सेना का समर्थन मिलता है, वह राज कर सकता है. जैसे ही सेना अपना समर्थन वापस ले लेती है शासक को हटाना पड़ता है. यदि शासक नहीं हटता तो उसे सेना जबरदस्ती हटा देती है. उसने ऐसा कई बार किया है. पिछली बार नवाज शरीफ को भी सेना अध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने हटाकर गिरफ्तार कर लिया था और शासन संभाल लिया था. पाकिस्तान में 1947 के बाद आधे समय से अधिक समय तक सेना ने राज किया है. इमरान खान भी पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा का विश्वास खो चुके थे. इसी का परिणाम है कि अब वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैं. जो भी हो पाकिस्तान के घटनाक्रम से भारत को सतर्क होने की आवश्यकता है, क्योंकि जब जब पाकिस्तान का शासन सेना के अधीन आया है तब तक भारत की परेशानियां बढ़ी हैं. जनरल याह्या खान, जनरल जिया उल हक और जनरल परवेज मुशर्रफ के शासन में पाकिस्तानी सेना ने भारत पर प्रत्यक्ष और परोक्ष हमले किए हैं. यही वजह है कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को विदेश मंत्री जयशंकर प्रसाद के साथ बैठक कर घटनाक्रम की जानकारी ली और आगे की रणनीति पर विचार किया. दक्षिण एशिया में शांति के लिए यह बहुत आवश्यक है कि पाकिस्तान में स्थिर और मजबूत सरकार हो और वहां शांति बनी रहे. भारत को इस घटनाक्रम पर कड़ी निगाहें रखना चाहिए और पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए.

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