2023 में सुयोग्यता के मापदंड

एक अच्छे नेता में नेतृत्व का गुण होता है. इसी गुण के आधार पर नेता जनता का मार्गदर्शन करता है और उनके हित से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाने की पहल करता है. नेता वही है जिसका लक्ष्य जनता के हित के कार्य करना और समाज के उत्थान के प्रयास करना हो ताकि हर व्यक्ति प्रगति कर सके, हर व्यक्ति सुरक्षित महसूस कर सके इसलिए अच्छा नेता वही है जिसके जीवन का लक्ष्य स्वयं का लाभ न होकर जनता का कल्याण हो. एक अच्छा और सफल नेता वही है जिसे जनता से जुड़ाव हो. जनता की तकलीफों और परेशानियों को जो अपना समझे और उन्हें दूर करने के लिए प्रयास तेज कर दे, वही सच्चा नेता है. एक अच्छा नेता समाज के हर वर्ग और तबके को एकसमान दृष्टि से देखता है और उनके साथ एक जैसा सद्भाव रखता है. जनप्रतिनिधि होने के कारण नेता को आलोचना से गुजरना ही पड़ता है. ऐसे में एक अच्छा नेता आलोचना को शांति से सुनता है और बिना आक्रामक प्रतिक्रिया दिए अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करता जाता है. हमने देश की स्वतंत्रता के उपरांत लोकतांत्रिक व्यवस्था को अंगीकार किया, अर्थात हम चुनाव प्रणाली के जरिए सांसद, विधायक और पार्षद के रूप में अपने नेता को चुनते हैं. हमने क्या कभी विचार किया कि हम जिन लोगों के हाथों में अपने नेतृत्व की कमान सौंपने जा रहे हैं, उनमें उपरोक्त सभी गुण या अहर्ताएं हैं. लोगों का जवाब क्या होगा, यह कहने की जरूरत नहीं है.

बहरहाल, हम यहाँ बात कर रहे हैं भोपाल में दो दिन चली भाजपा की फीडबैक बैठक की जिसमें दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए विधायकों से सरकार और उसके कामकाज को लेकर सवाल पूछे गए. बीच के सवा साल छोड़ दें तो भाजपा पिछले दो दशक से सूबे की सत्ता में है. इस फीडबैक बैठक के निष्कर्ष के आधार पर पार्टी ने टिकट की स्पर्धा में शामिल अपने नेताओं को साफ पैगाम दे दिया है कि टिकट उसे ही मिलेगा, जिसका काम बोलेगा. आसार यही बन रहे हैं कि भाजपा अपने उन विधायकों के टिकट साफ कर सकती है जो न तो जनापेक्षाओं पर खरे उतरे हैं और जिन्होंने न संगठन के मापदंडों को पूर्ण किया है. गुजरात में पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण का जो फार्मूला अपनाया गया था, उसे मप्र में फॉलो किया जा सकता है. भाजपा के चुनावी रणनीतिकार अंदरखाने की मंत्रणाओं में इस बात को कुबूल करते हैं कि टिकट वितरण में सावधानी न बरते जाने के कारण ही 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत के जरूरी आंकड़े से कुछ पीछे रह गई थी. किसी भी बड़े राजनीतिक दल को चुनाव में टिकट वितरण के समय कई प्रेशर ग्रुप्स का सामना करना पड़ता है, मसलन छत्रपों को संतुष्ट करना, जातिगत सन्तुलन बिठाना, दलबदल कर आने वालों से किया टिकट का वादा मुकम्मल करना. जाहिर है कि भाजपा को भी इन दवाबों का सामना करना पड़ा होगा. यही वजह है कि सत्तारूढ़ दल चुनाव के दो बरस पहले ही टिकट से जुड़ा अपना एक्शन प्लान तय कर लेना चाहता है ताकि अभी से उक्त ब्लूप्रिंट पर काम शुरू किया जा सके.

यह मसले सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं हैं. मप्र में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी उन्हीं मुद्दों से दो-चार है, जिनसे सत्ताधारी दल जूझ रहा है. व्यापक पैमाने पर हुए दलबदल की परिणति स्वरूप मार्च 2020 में सवा साल पुरानी कांग्रेस सरकार जब अधोगति को प्राप्त हुई तब पार्टी के भीतर व्यक्तिगत आस्था व दलीय निष्ठा का सवाल गहराया था, जिससे यह पार्टी अभी तक उबर नहीं सकी है. यह सच है भाजपा की तुलना में कांग्रेस में ज्यादा प्रेशर ग्रुप एक्टिव रहते हैं, नतीजन समझौते के नाम पर कई ऐसे कार्यकर्ता भी टिकट पा जाते हैं जिनके जीतने की संभावना उनके नाम के ऐलान के दिन से ही नहीं रहती है. जाहिर है कि टिकट वितरण को लेकर सर्वसम्मत फार्मूला बनाने के लिए कांग्रेस में भी मंत्रणाओं की खदबदाहट महसूस की जा रही है. दलनिरपेक्ष भाव से सोचा जाए तो चाहे भाजपा हो अथवा कांग्रेस, टिकट ऐसे ही कर्मठ व जनोन्मुखी कार्यकर्ता को दिया जाना चाहिए जिसमें अपने क्षेत्र की जनता की निस्वार्थ सेवा का असीम जज्बा हो व देश-प्रदेश की व्यापक आवश्यकताओं के मापदंड पर खुद को खरा साबित करने का माद्दा हो. टिकटार्थी की चाहे दलीय निष्ठा हो अथवा व्यक्तिगत, इससे फर्क नहीं पड़ता है, उसे बस अपने मतदाताओं के प्रति समर्पित होना चाहिए. मौजूदा विधायकों को टिकट देते समय उनका पांच साल का रिपोर्ट कार्ड भी खंगालना चाहिए. आम तौर पर मतदाता के समक्ष दो या तीन मुख्य दलों के प्रत्याशियों में से ही एक को चुनने की विवशता रहती है, इसलिए भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा सहित सभी दलों की चुनाव स्क्रीनिंग कमेटी को एक्सरे मशीन की मानिंद ही गुड-बैड टच खंगालते हुए सुयोग्य प्रत्याशी का चयन कर जनता के सामने प्रस्तुत करना चाहिए.

नव भारत न्यूज

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