केन्द्रीय जेल जबलपुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इतिहास से जुड़ा़ है

शहीद टंट्या भील की शहीद स्थली केन्द्रीय जेल से पवित्र मिट्टी खण्डवा भेजी जाएंगी

जबलपुर:  जिले के प्रभारी एवं लोक निर्माण कुटीर एवं ग्रामोद्योग मंत्री गोपाल भार्गव के मुख्य आतिथ्य में 25 नवम्बर को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस केन्द्रीय जेल जबलपुर में अमर शहीद टट्या भील की शहीद स्थली केन्द्रीय जेल से पवित्र मिट्टी खण्डवा ले जाने का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जायेगा। उक्त कार्यक्रम के संबंध में कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने आज सेंट्रल जेल जबलपुर का दौरा कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री टंट्या भील की शहीद स्थली और कार्यक्रम स्थल को देखा। उन्होंने कहा कि शहीद टंट्या भील की शहीद स्थली की पवित्र मिट्टी सम्मान पूर्वक खंडवा भेजी जायेगी।

टंट्या भील उन महान क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने बारह साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया और विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के अपने अदम्य साहस और जुनून के कारण जनता के लिए खुद को तैयार किया। राजनीतिक दलों और शिक्षित वर्ग ने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए जोरदार आंदोलन चलाया। टंट्या भील, भील जनजाति के सदस्य थे। उनका जन्म 1840 में तत्कालीन मध्य प्रांत के पूर्वी निमाड़ (खंडवा) की पंधाना तहसील के बडाडा गाँव में हुआ था, जो वर्तमान में भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में स्थित है। माना जाता है की वह बचपन से ही साहसी, होशियार थे। टंट्या भील गुरिल्ला युद्ध में निपुण थे। वह एक महान निशानेबाज भी थे और पारंपरिक तीरंदाजी में भी दक्ष थे। “दावा” या फलिया उनका मुख्य हथियार था।

उन्होंने बंदूक चलाना भी सीख लिया था।ट्ंटया भील ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। वह आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बन गए। लगभग एक सौ बीस साल पहले टंट्या भील जनता के एक महान नायक के रूप में उभरे और तब से भील जनजाति का एक गौरव बन चुके है। वह वंचितों का मसीहा था। उन्हें सभी आयु वर्ग के लोगों द्वारा लोकप्रिय रूप से मामा कहा जाता था। उनका यह संबोधन इतना लोकप्रिय हुआ कि भील आज भी “मामा” कहे जाने पर गर्व महसूस करते हैं। वह चमत्कारिक ढंग से उन लोगों तक पहुंच जाता था जिन्हें आर्थिक मदद की जरूरत होती थी।

टंट्या भील को धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। इंदौर में ब्रिटिश रेजीडेंसी क्षेत्र में सेंट्रल इंडिया एजेंसी जेल में रखा गया था। बाद में उन्हे सख्त पुलिस सुरक्षा में जबलपुर ले जाया गया। उन्हें भारी जंजीरों से जकड़ कर जबलपुर जेल में रखा गया जहां ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें अमानवीय रूप से प्रताड़ित किया। उस पर तरह-तरह के अत्याचार किए गए और केन्द्रीय जेल जबलपुर में 4 दिसम्बर 1889 को फांसी दी गई। टंट्या भील का वास्तविक नाम तांतिया था, जिन्हे प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उन्हें “भारत के रॉबिन हुड” के रूप में जाना जाता है।

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