मानवाधिकार की चिंता

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 28 वें स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कही गई बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने मानवाधिकार को लेकर सिलेक्टिव चिंता जताने की आलोचना की है.
दरअसल, जम्मू-कश्मीर में सिखों और हिंदुओं की चुन-चुनकर हत्या पर पीएम नरेंद्र मोदी ने चुप्पी ओढ़े विपक्षी दलों और मानवाधिकारों के लिए जब-तब प्रदर्शन करने वाले लोगों को साफ तौर पर सुना दिया है. पीएम मोदी ने कहा कि एक ही प्रकार की किसी घटना में कुछ लोगों को मानवाधिकार का हनन दिखता है और वैसी ही किसी दूसरी घटना में उन्हीं लोगों को मानवाधिकार का हनन नहीं दिखता. प्रधानमंत्री श्री मोदी के इस बयान को पिछले दिनों कश्मीर में हिंदुओं और सिखों की टारगेट किलिंग से जोडक़र देखा जा रहा है. इस मामले में प्रधानमंत्री की चिंता सही है. उनका यह कहना भी सही है कि मानव अधिकारों पर चुनिंदा व्यवहार लोकतंत्र के लिए खतरा है. उन्होंने कहा, मानवाधिकार का बहुत ज्यादा हनन तब होता है जब उसे राजनीतिक रंग से देखा जाता है, राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, राजनीतिक नफा-नुकसान के तराजू से तौला जाता है.

दरअसल, इस तरह का सलेक्टिव व्यवहार, लोकतंत्र के लिए भी उतना ही नुकसानदायक होता है. वस्तुत: हाल के वर्षों में मानवाधिकार की व्याख्या कुछ लोग अपने-अपने तरीके से, अपने-अपने हितों को देखकर करने लगे हैं.इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही और सटीक बात कही है. हमारे देश में कथित मानवाधिकार संगठन मानवाधिकार के नाम पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार करते हैं. दिल्ली के सिख नरसंहार या कश्मीर में पंडितों के साथ हुए अत्याचार का संज्ञान यह कथित मानवाधिकार संगठन नहीं लेते लेकिन आतंकवादियों के पक्ष में यह हमेशा खड़े होते हैं. इसी तरह सेना की कार्रवाई का विरोध भी यही लोग करते हैं. पिछले दिनों मानवाधिकार संगठन की एक कार्यकर्ता ने तो यहां तक कह दिया था कि उन्हें संघ के लोगों को मारे जाने से खुशी मिलती है. केरल में आए दिन संघ कार्यकर्ताओं की हत्या होती है, लेकिन यह संगठन चुप रहते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. मानवाधिकार संगठनों के पक्षपातपूर्ण रवैए के कारण ही इनका महत्व खत्म होता जा रहा है. लोग इन्हें देश विरोधी तक मानने लगे हैं.
प्रधानमंत्री ने मानवाधिकार को लेकर सिलेक्टिव कार्रवाई पर बिल्कुल सही समय पर सही बात रखी है. इस पर विचार किया जाना चाहिए.इसमें भी कोई शक नहीं कि भारत का मानवाधिकार के संबंध में रिकॉर्ड बहुत अच्छा है. ऐसे समय में जब पूरी दुनिया हिंसा में झुलस रही है, भारत ने पूरी दुनिया को अधिकार और अहिंसा का मार्ग सुझाया है. बापू को देश ही नहीं, पूरा विश्व मानव अधिकारों और मानवीय मूल्यों के प्रतीक के रूप मे देख रहा है.बीते दशकों में ऐसे कितने ही अवसर विश्व के सामने आए हैं, जब दुनिया भ्रमित हुई है, भटकी है लेकिन भारत मानवाधिकारों के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहा है, संवेदनशील रहा है. इसके बावजूद कतिपय संगठन हमारे देश को बदनाम करने में लगे रहते हैं. यह ठीक नहीं है. इसे रोका जाना चाहिए. मानवाधिकार संगठन तभी विश्वास अर्जित कर पाएंगे, जब वे निष्पक्ष होकर घटनाओं को देखेंगे और उस पर प्रतिक्रिया देंगे.

 

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