पंजाब: संदेश और चुनौतियां

पंजाब कांग्रेस विधायक दल के नवनिर्वाचित नेता चरणजीत सिंह चन्नी ने सोमवार को पंजाब के मुख्यमंत्री के पद पर शपथ ले ली. इसी के साथ सत्ता परिवर्तन का एक अध्याय पूर्ण हुआ. नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं. जिनमें राजनीतिक, प्रशासनिक और धार्मिक चुनौती अधिक हैं. चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब कांग्रेस के विवादास्पद नेता रहे हैं. अनेक बार महिलाओं ने उनके खिलाफ आरोप लगाए हैं. वे महिला उत्पीडऩ के खिलाफ प्रारंभ हुए ‘मी टू’ अभियान के भी चपेट में आ चुके हैं. मंत्री रहने के दौरान भी उन्होंने अनेक बार विवादास्पद कार्य भी किए हैं और बयान भी दिए हैं. ऐसे में वे पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य की कमान किस तरह से संभालते हैं यह देखना होगा. चरणजीत सिंह चन्नी के पास बहुत कम समय है. राज्य में 6 माह के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में वे कितना कुछ कर पाते हैं, यह भी देखने की बात होगी. उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस में व्याप्त गुटबाजी को समाप्त करना होगी. उनके शपथ ग्रहण समारोह में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने शामिल ना हो कर एक तरफ से बगावत के संकेत दे दिए हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह अनुभवी और अत्यंत महत्वाकांक्षी नेता हैं. वे खामोशी से सत्ता परिवर्तन स्वीकार कर लेंगे इसमें संदेह है.
दूसरी तरफ पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू की कोशिश रहेगी कि चरणजीत सिंह चन्नी उनके डमी बन कर काम करें. राजनीति में कोई किसी का डमी नहीं होता. मुख्यमंत्री के पद पर बैठने के बाद नेता के तेवर ही बदल जाते हैं. अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ भी नाराज हैं. उन्होंने भी अपना असंतोष खुलकर प्रकट किया है.वे भी कोप भवन में हैं. पंजाब में इन तीनों के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री राजेंद्र कौर भ_ल, पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी और पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी के भी अपने-अपने समर्थक और गुट हैं. जाहिर है चरणजीत सिंह चन्नी को तलवार की धार पर चलना होगा. पंजाब आतंकवाद प्रभावित राज्य रहा है. यहां की कानून और व्यवस्था को संभालना वैसे भी चुनौतीपूर्ण होता है. चरणजीत सिंह चन्नी के समक्ष राज्य की गिरती आर्थिक स्थिति, बंद होते उद्योग, युवाओं में युवाओं में नशे की आदत का बढ़ता प्रचलन, किसानों का असंतोष, बेरोजगारी जैसे अनेक बड़े प्रश्न हैं जिनके उत्तर उन्हें अपने अल्प अनुभव से खोजना होंगे. इनके अलावा मुख्यमंत्री पद से वंचित शक्तिशाली जाट सिख समुदाय को संतुष्ट करना भी बड़ी चुनौती है. जाट सिख शासक की मानसिकता में ही रहते हैं. वे किसी दलित को मुख्यमंत्री के रूप में पचा पाएंगे इसकी संभावना कम है. जहां तक संदेश का प्रश्न है तो यह स्पष्ट है कि पंजाब की 32 फ़ीसदी दलित आबादी को संतुष्ट करने के लिए पहली बार राज्य में दलित मुख्यमंत्री का प्रयोग किया गया है. कांग्रेस को इसका लाभ मिलता, यदि सत्ता परिवर्तन असंतोष और बगावत के कारण नहीं होता. दूसरा यह कि चरणजीत सिंह चन्नी को लाने में बहुत देर हो चुकी है. मात्र 6 महीने पूर्व उन्हें मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस कोई बड़ा लक्ष्य हासिल करेगी ऐसा लगता नहीं है. जहां तक दलितों का प्रश्न है तो यह अनुभव है कि अनेक दलित केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्री भी उनका भला नहीं कर सके हैं. इसके विपरीत अनेक ऐसे गैर दलित नेता रहे हैं जिन्होंने दलितों का अधिक भला किया है. नाम ही लेना हो तो महादेव गोविंद रानाडे, महात्मा गांधी ,आचार्य राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण के नाम दिए जा सकते हैं.
जाहिर है कांग्रेस ने दलितों को संदेश देने की कोशिश की है लेकिन वह इसमें कितना सफल होगी यह देखना होगा.बहरहाल, आशा की जानी चाहिए कि चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब को सुशासन देंगे.

नव भारत न्यूज

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