आदिवासी अंचल बन गया है चुनावी रण का मैदान…

सियासत

राहुल गांधी के भारत जोड़ो यात्रा और मुख्यमंत्री के मालवा निमाड़ में लगातार हो रहे दौरों से जाहिर है कि आदिवासी वोटों को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच घमासान मचा हुआ है। 4 दिसंबर को राज्यपाल और मुख्यमंत्री की मौजूदगी में टंट्या मामा के बलिदान दिवस को जोर शोर से मनाया गया। इसके पूर्व 15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती पर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने आदिवासी अंचल के 89 विकास खंडों में पेसा एक्ट लागू करने का ऐलान किया। खास बात यह है कि इनमें से 40 विकासखंड मालवा निमाड़ में आते हैं।दरअसल, दोनों दलों का फोकस प्रदेश के दो करोड़ आदिवासियों पर है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही रणनीतिकार मानते हैं कि प्रदेश के आदिवासी जिस दल के साथ होंगे, सत्ता उसी दल की होगी। इस कारण से आदिवासियों को लुभाने में कांग्रेस और भाजपा के बीच होड़ मची हुई हैं।

कमलनाथ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से बने माहौल को संगठन की मजबूती में लगाने के लिए मालवा निमाड़ के फिर से दौरे कर सकते हैं। उनके अलावा प्रदेश प्रभारी जेपी अग्रवाल का भी फोकस मालवा निमाड़ पर होगा। दूसरी और भाजपा आदिवासियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता के साथ ही केंद्र तथा राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही जन कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दे रही है। भाजपा को संघ परिवार के नेटवर्क का भी अतिरिक्त लाभ है।संघ परिवार का भी पूरा फोकस आदिवासी अंचल पर है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मध्यप्रदेश के अपने प्रत्येक प्रवास में संघ परिवार के पदाधिकारियों से कहा है कि आदिवासी क्षेत्र में कार्य विस्तार के विशेष प्रयास किए जाएं।

संघ अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में आदिवासी क्षेत्र में प्रतिदिन लगने वाली शाखाओं को बढ़ाने वाला है। इस संबंध में लक्ष्य निर्धारित कर दिए गए हैं। भाजपा 2018 की गलतियों को दोहराना नहीं चाहती। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अति आत्मविश्वास में आ गई थी। इस कारण से उसमें आदिवासी अंचल पर अधिक ध्यान नहीं दिया। नतीजा यह रहा कि आदिवासियों के लिए सुरक्षित 47 में से 31 सीटें उसके हाथ से चली गई। खास तौर पर मालवा निमाड़ में उसे नुकसान हुआ। यहां उसने आदिवासी सुरक्षित सीटों में से केवल 5 में ही जीत हासिल की। धार, झाबुआ, अलीराजपुर, बड़वानी और खरगोन जिलों की आदिवासी सीटों पर भाजपा का लगभग सफाया हो गया। पार्टी ने इससे सबक सिखा और वापसी करने की कोशिश की है।भाजपा 2023 में आदिवासी अंचल किसी भी हालत में अपने हाथों से जाने नहीं देना चाहती हैं। दूसरी तरफ आदिवासी मतदाताओं की निर्णय की स्थिति को कमलनाथ भी जानते हैं। कमलनाथ को प्रबंधन और रणनीति का महागुरु माना जाता है इसलिए उन्होंने भी अपना पूरा फोकस आदिवासी अंचल पर कर रखा है।

2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को आदिवासी सुरक्षित 47 में से क्रमशः 36 और 31 सीटें मिली थी,लेकिन 2018 में उसका आदिवासी सीटों से सफाया हो गया था तब कांग्रेस को 31 सीटें हासिल हुई थी नतीजे में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो सकी थी। भाजपा ने 2018 की पराजय के बाद लगातार आदिवासी क्षेत्र में काम किया है।इसी का नतीजा है कि 2020 के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने आदिवासी अंचल की नेपानगर, जोबट जैसी सीटों पर जीत हासिल की। इसके अलावा खंडवा लोकसभा में जीत दर्ज की जहां एक लाख से अधिक आदिवासी मतदाता हैं।खरगोन जिले में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी,लेकिन खरगोन के उपद्रव के बाद वहां स्थिति बदली है इसी तरह भाजपा ने पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव में झाबुआ,अलीराजपुर,बड़वानी,खरगोन जिले में बेहतरीन प्रदर्शन किया है।भाजपा के लिए मालवा निमाड़ में वापसी करना जरूरी था।पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव के परिणामों ने जाहिर किया कि मालवा निमाड़ का गढ़ फिर से उसने फतह कर लिया है।प्रदेश में 47 विधानसभा सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं, लेकिन आदिवासियों का प्रभाव 80 से अधिक सीटों पर निर्णायक माना जाता है।प्रदेश के 17 जिले आदिवासी बहुल माने जाते हैं। भाजपा आदिवासी नेतृत्व को भी बढ़ावा देने की लगातार कोशिश कर रही है।

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