कब सबक लेगी कांग्रेस ?

लगता है कांग्रेस ने कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गोवा और पंजाब से कोई सबक नहीं सीखा है. राजस्थान में जो घमासान मचा हुआ है उसका कारण कांग्रेस नेतृत्व द्वारा लिया गया अपरिपक्व निर्णय हैं. आखिर कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत ने नामांकन ही नहीं भरा. जब उनका निर्वाचन ही नहीं हुआ. तो राजस्थान में मुख्यमंत्री बदलने की जल्दबाजी क्यों की गई ? कांग्रेस अध्यक्ष पद के निर्वाचन का फैसला या तो 30 सितंबर को होता जब नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि थी या फिर 19 अक्टूबर को जब मतदान के बाद परिणाम घोषित होते. यदि अशोक गहलोत इकलौते उम्मीदवार होते तो कांग्रेस अध्यक्ष पद पर 30 सितंबर को निर्विरोध निर्वाचन हो जाता. यदि इस पद के लिए मतदान की नौबत आती तो 17 अक्टूबर को मतदान और 19 अक्टूबर को परिणाम आते. यह ठीक है कि आलाकमान द्वारा समर्थन होने के कारण अशोक गहलोत का निर्वाचन तय था लेकिन आलाकमान ने उनके नामांकन भरने से पहले ही यह मान लिया कि वे कांग्रेस अध्यक्ष बन गए हैं. यही नहीं उन्हें अध्यक्ष निर्वाचित मान कर उन पर एक व्यक्ति एक पद का फार्मूला लागू करने की कोशिश की गई और एक तरह से राजस्थान का मुख्यमंत्री पद रिक्त घोषित कर दिया गया. यही नहीं मीडिया में यह खबर फैलाई गई कि कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को कमान सौंपने का फैसला कर लिया है. राजस्थान में विधायक दल की बैठक बुलाकर नेता निर्वाचित करवाने की कवायद करने की क्या आवश्यकता थी ? कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस तरह की सलाह किसने दी ? जाहिर है कांग्रेस ने राजस्थान का संकट खुद आमंत्रित किया और अपनी नाक कटवा ली. जैसे ही राजस्थान कांग्रेस विधायक दल को बैठक बुलाने की जानकारी लगी. सभी कांग्रेसी विधायक हतप्रभ रह गए. सचिन पायलट की दावेदारी ने आग में घी का काम किया. नतीजे में करीब 90 विधायकों ने अशोक गहलोत के समर्थन में बगावत कर दी. अभूतपूर्व स्थिति उत्पन्न हो गई. कांग्रेस के विधायकों ने आलाकमान द्वारा भेजे गए दोनों पर्यवेक्षकों अजय माकन और मल्लिकार्जुन खडग़े से मिलने से ही इंकार कर दिया. विधायक दल की बैठक में दोनों पर्यवेक्षक विधायकों का इंतजार करते रहे लेकिन वहां करीब डेढ़ दर्जन विधायक ही पहुंचे. करीब 90 विधायक गहलोत समर्थक मंत्री शांति धारीवाल के निवास पर एकत्रित हुए, जहां उन्होंने एक स्वर से सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का विरोध किया.करीब 3 दिनों तक चले हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद दोनों पर्यवेक्षक खाली हाथ लौट गए. अजय माकन ने तो सार्वजनिक तौर पर गहलोत समर्थकों पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया. आलाकमान ने दोनों पर्यवेक्षकों से लिखित में रिपोर्ट मांगी. अब न केवल कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पेच फंस गया है बल्कि राजस्थान में स्थिरता से चल रही सरकार भी संकट में फंस गई है. इस संकट का समाधान कांग्रेस नेतृत्व को सूझ नहीं रहा है. कांग्रेस नेतृत्व इस बात से भी हैरान है कि जिन अशोक गहलोत को सबसे वफादार माना जा रहा था उन्होंने इतनी बड़ी बगावत कैसे कर दी. इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी जाहिर हुई है. दरअसल होना तो यह था कि यदि अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाना था तो उन्हें पहले अध्यक्ष निर्वाचित कराया जाता और फिर उनसे राजस्थान के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा लिया जाता. इसी तरह सचिन पायलट के नाम की घोषणा करने से पहले कांग्रेस ने यह आकलन कर लेना चाहिए था कि विधायक दल में किसका बहुमत है ? राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन के लिए कांग्रेस अध्यक्ष के निर्वाचन संपन्न होने की राह देखी जानी चाहिए थी. दरअसल, नेतृत्व ने परिपक्वता और समझदारी से काम लिया होता तो यह संकट उत्पन्न नहीं नहीं होता. अब कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर और राजस्थान दोनों ही स्थानों पर डैमेज कंट्रोल करना पड़ रहा है. संकट का जो भी समाधान होगा वह स्थाई होगा इसकी गारंटी नजर नहीं आ रही है. कहा जा रहा है कि अशोक गहलोत पर अब कांग्रेस आलाकमान दाव नहीं लगाएगा. कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए विकल्पों की तलाश चल रही है . बहरहाल, समूचे घटनाक्रम से एक बार फिर कांग्रेस की कमजोरी जाहिर हुई है, जो उसके लिए फिर संकट का कारण बनेगी.

नव भारत न्यूज

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